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शहर में सूर्यास्त

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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बर्बरता की ढाल ठाकरे

कवि: नागार्जुन

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

कैसे फ़ासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे !

अबे सँभल जा, वो पहुँचा बाल ठाकरे !

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

कैसे फ़ासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे !

अबे सँभल जा, वो पहुँचा बाल ठाकरे !

सबने हाँ की, कौन ना करे !

छिप जा, मत तू उधर ताक रे !

शिव-सेना की वर्दी डाटे, जमा रहा लय-ताल ठाकरे !

सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे !

गूँज रहीं सह्याद्री घाटियाँ, मचा रहा भूचाल ठाकरे !

मन ही मन कहते राजा जी, जिये भला सौ साल ठाकरे !

चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !

कौन नहीं फँसता है देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

बर्बरता की ढाल ठाकरे !

प्रजातन्त्र का काल ठाकरे !

धन-पिशाच का इंगित पाकर, ऊँचा करता भाल ठाकरे !

चला पूछने मुसोलिनी से, अपने दिल का हाल ठाकरे !

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

मूल भाषा: Hindi

© नागार्जुन

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