समकालीन हिंदी कवयित्री, आधुनिक एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कविताओं के लिए चर्चित।
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' (1936–1975) साठोत्तरी हिंदी कविता के अत्यंत सशक्त और जनपक्षधर कवि थे। अपनी तीखी राजनीतिक चेतना और बेबाक शैली के लिए विख्यात धूमिल ने 'संसद से सड़क तक' जैसे संग्रहों के माध्यम से समकालीन समाज और राजनीति के अंतर्विरोधों पर गहरा प्रहार किया। उन्हें मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अदम गोंडवी (1947–2011) जनपक्षधरता, क्रांतिकारी चेतना और तीखे राजनीतिक व्यंग्य के बेबाक कवि थे। उन्होंने अपनी ग़ज़लों और कविताओं के माध्यम से हाशिए के समाज की आवाज़ को बुलंद किया और व्यवस्था की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार किया।
कुंवर नारायण (1927–2017) आधुनिक हिंदी साहित्य के मूर्धन्य कवि और विचारक थे। उनकी काव्य-दृष्टि में इतिहास, मिथक और समकालीन मानवीय नियति का गहरा दार्शनिक समन्वय मिलता है।
प्रगतिशील काव्य-धारा के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000) अपनी यथार्थवादी और जनसरोकार से जुड़ी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। पेशे से वकील रहे केदारनाथ जी की रचनाओं में प्रकृति-प्रेम और शोषित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई देती है। उन्हें 'केन का कवि' भी कहा जाता है।
कैफ़ी आज़मी (1919–2002) हिंदी और उर्दू साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि और गीतकार थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक चेतना, रूमानियत और क्रांतिकारी विचारों का अनूठा समन्वय किया। 'आवारा सज्दे' उनका कालजयी काव्य-संग्रह है।
जसिंता केरकेटा झारखण्ड के पश्चिम सिंहभूम ज़िले से ताल्लुक रखने वाली प्रमुख हिंदी कवयित्री, लेखिका और स्वतंत्र पत्रकार हैं। अपनी रचनाओं में वे आदिवासी समाज की जिजीविषा, जल-जंगल-ज़मीन के अधिकारों और मानवीय संवेदनाओं को मुखरता से अभिव्यक्ति देती हैं।
जनकवि नागार्जुन (वास्तविक नाम: वैद्यनाथ मिश्र) प्रगतिशील काव्यधारा के मूर्धन्य कवि, उपन्यासकार और गद्यकार हैं। उन्होंने हिंदी और मैथिली (यात्री उपनाम से) में युगीन यथार्थ, जन-आकांक्षाओं और राजनीतिक विद्रूपताओं पर अत्यंत प्रखर, तीखी और व्यंग्यात्मक कविताएँ लिखीं। लोक-जीवन से गहरा जुड़ाव उनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है।
निर्मला पुतुल समकालीन हिंदी साहित्य की एक प्रमुख आदिवासी कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी कविताएँ जल-जंगल-ज़मीन, संताल समुदाय की जीवन-स्थितियों और स्त्री-विमर्श के प्रामाणिक प्रश्नों को प्रखरता से उठाती हैं।
नेहा नरुका समकालीन हिंदी साहित्य की कवि और लेखिका हैं। 'फटी हथेलियाँ' उनका प्रमुख काव्य-संग्रह है तथा 'अकाल' और 'जवान लड़की की लाश' उनकी प्रमुख बहुचर्चित रचनाएँ हैं।
पराग पावन समकालीन हिंदी साहित्य के कवि हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार और आधुनिक जीवन के यथार्थ की स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है। 'बेरोज़गार' उनकी प्रमुख कविताओं में से एक है।
