अकाल
कवि: नेहा नरुका
जिसने अकाल देखा हो वह थोड़ा-सा गेहूँ हमेशा बचाकर रखता है बेशक, उस गेहूँ में घुन लग गया हो, पर फिर भी अकाल देख चुका व्यक्ति उस गेहूँ को फेंकता नहीं वह अपना ज़रूरी समय घुन बीनने में गँवाता है वह इन्तज़ार करता है खिलकर आई ध...
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

कविताएँ
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नेहा नरुका की प्रकाशित कविताओं की एक केंद्रित पाठ-यात्रा।
कवि अभिलेख
कवि: नेहा नरुका
जिसने अकाल देखा हो वह थोड़ा-सा गेहूँ हमेशा बचाकर रखता है बेशक, उस गेहूँ में घुन लग गया हो, पर फिर भी अकाल देख चुका व्यक्ति उस गेहूँ को फेंकता नहीं वह अपना ज़रूरी समय घुन बीनने में गँवाता है वह इन्तज़ार करता है खिलकर आई ध...
कवि: नेहा नरुका
बच्चे खेल रहे थे, उन्हें लगा यह भी कोई नया खेल है वे भी भागने लगे भागते भागते मर्द आगे निकल गए बच्चे पीछे रह गए