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शहर में सूर्यास्त

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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शबनम की ईद

कवि: मनीष कुमार यादव

एक समय था सृष्टि में

हर ओर शबनम व्याप्त थी

भगवान और अल्लाह नहीं थे

तब भी वहाँ पर्याप्त थी

उसके होने से ही तो

पहले वहाँ इंसान आए

फिर ख़ुदा-भगवान आए

और फिर झगड़े हुए

पिछलों से भी तगड़े हुए

एक समय था सृष्टि में

हर ओर शबनम व्याप्त थी

भगवान और अल्लाह नहीं थे

तब भी वहाँ पर्याप्त थी

उसके होने से ही तो

पहले वहाँ इंसान आए

फिर ख़ुदा-भगवान आए

और फिर झगड़े हुए

पिछलों से भी तगड़े हुए

वह उठ खड़ा होता है कहता

एक धुर हिंदू हूँ मैं

देश के अभिमान-गौरव

का स्वयं बिंदु हूँ मैं

उससे बड़ा एक और भी था

जिसको आता कुछ नहीं था

जेब में आना नहीं था

पेट में दाना नहीं था

अक्ल से समतल-सपाट

और थे बने हिंदू विराट

थी एक मेहंदी की दुकान

उसपर चढे़ बैठे मचान

बानर कहें खुद को सुजान

ऐसे बने भारत महान

एक शबनम थी वहाँ भी

हाथ यह देखो मेरा भी

हो रहा बैरंग कैसा

रंग तो भर दो हिना की

हाँ ईद है तो याद रखना

एक सुंदर चांद रखना

चांद सुनकर जो वह बिदका

काम से अपने वह भटका

याद कुछ आया उसे तब

और वह बोला सुनो अब

यह जो तुम हंसमुख खड़े हो

चांद की बातें करे हो

यह नहीं हमको बनाना

हाय रे! कैसा ज़माना

तुम मुसलमां, हम हैं हिंदू

विश्व गुरु हम, केंद्र बिंदु

तुम चले जाओ यहाँ से

लौट न आना यहाँ पे

मैं खड़ा हो सोचता हूँ

इस भले से पूछता हूँ

दो नए पैसे बनेंगे

घर-बढ़े बच्चे पलेंगे

क्यूँ नहीं चंदा बनाना

ईद है, खुशियां मनाना

कह रहा सुन लो ऐ बाबू

हम हैं हो सकते बेकाबू

मुझको न दो तुम ईद की

ऐसी कोई शुभकामना

जिससे पराए धर्म से

हो जाए मेरा सामना

कर डाला तो यह पाप होगा

घोर-अनर्थ अपराध होगा

इनका यहाँ चंदा बनेगा

अपना नहीं धंधा चलेगा

ईश कल आकर कहे हैं

देश को हिंदू बना दे

हम नहीं करते तुम्हारी

जा! नहीं चंदा बनाते

लाख मिन्नत बात कर ली

दिन के बैठे रात कर ली

पत्थर हृदय पिघला नहीं

दिखता है, कुछ धुंधला नहीं

यह जो नया भारत गढ़ा है

देखो गड़हे में पड़ा है

गड़हे में है जनता बीमार

उसको धरम का है बुखार

नेता कहैं हमको पता है

कैसे करें सब कुछ सुचार

लेकिन कोई नीयत नहीं है

सूरत नहीं, सीरत नहीं है

हमने जो सोचा बनेगा

यह वही भारत नहीं है

तुम अभी से चांद लेकर

हाथ शबनम के धरो

ईश के भारत से हटकर

प्रेम का भारत गढ़ो

कल को कोई कह न पाए

यह वही भारत नहीं है

अपने भारत में तो शबनम

का बहुत सम्मान है

और चंदा मामा जिनसे

रात-रौनक-जान है

दोनों मिल कर सृष्टि को

जीवन, सचलता दे रहे

और तुम सोचे हो शबनम

साथ चंदा न रहे

यह तो अपने होने ही पर

एक बड़ा आघात है

चांद से पीछा छुड़ाकर

शिव कहाँ आबाद है?

सत्ता लोलुप धर्म का एक

रूप ऐसा रच रहे

तुम अनाड़ी पैजनी बन

मनु के पैरों नच रहे

मैं खड़ा हूँ, देखता हूँ

इससे तुमको क्या मिलेगा

एक मदहोशी मिलेगी

और न धेला मिलेगा

लुट-पिटे-हारे-मरे में

बाबा का ठेंगा मिलेगा

ईश का झोला नहीं

कच्चू नहीं केला मिलेगा

तुम ये सारा स्वांग सहना

भूख हो, जय हिंद कहना

मूल भाषा: Hindi

© मनीष कुमार यादव

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