प्रगतिशील काव्य-धारा के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000) अपनी यथार्थवादी और जनसरोकार से जुड़ी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। पेशे से वकील रहे केदारनाथ जी की रचनाओं में प्रकृति-प्रेम और शोषित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई देती है। उन्हें 'केन का कवि' भी कहा जाता है।
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' (1936–1975) साठोत्तरी हिंदी कविता के अत्यंत सशक्त और जनपक्षधर कवि थे। अपनी तीखी राजनीतिक चेतना और बेबाक शैली के लिए विख्यात धूमिल ने 'संसद से सड़क तक' जैसे संग्रहों के माध्यम से समकालीन समाज और राजनीति के अंतर्विरोधों पर गहरा प्रहार किया। उन्हें मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
जनकवि नागार्जुन (वास्तविक नाम: वैद्यनाथ मिश्र) प्रगतिशील काव्यधारा के मूर्धन्य कवि, उपन्यासकार और गद्यकार हैं। उन्होंने हिंदी और मैथिली (यात्री उपनाम से) में युगीन यथार्थ, जन-आकांक्षाओं और राजनीतिक विद्रूपताओं पर अत्यंत प्रखर, तीखी और व्यंग्यात्मक कविताएँ लिखीं। लोक-जीवन से गहरा जुड़ाव उनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है।
