धूप
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

कविताएँ
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चुना हुआ पाठ
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
कवि: साहिर लुधियानवी
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
कवि: मनीष कुमार यादव
एक समय था सृष्टि में हर ओर शबनम व्याप्त थी भगवान और अल्लाह नहीं थे तब भी वहाँ पर्याप्त थी उसके होने से ही तो पहले वहाँ इंसान आए फिर ख़ुदा-भगवान आए और फिर झगड़े हुए पिछलों से भी तगड़े हुए
कवि: नेहा नरुका
बच्चे खेल रहे थे, उन्हें लगा यह भी कोई नया खेल है वे भी भागने लगे भागते भागते मर्द आगे निकल गए बच्चे पीछे रह गए